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Sunday, April 23, 2023

सुप्रीम कोर्ट ने बेंगलुरु के सॉफ्टवेयर इंजीनियर कपल को तलाक पर दी सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने तलाक की मांग कर रहे एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर कपल से कहा है कि वे शादी को दूसरा मौका क्यों नहीं देते, क्योंकि दोनों एक-दूसरे को समय नहीं दे पा रहे. जस्टिस के एम जोसेफ और बी वी नागरत्ना की पीठ ने कहा, "शादी निभाने का समय आप लोगों को कहां मिला. आप दोनों बेंगलुरु में तैनात सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं. एक दिन में ड्यूटी पर जाता है और दूसरा रात में. आपको तलाक का कोई अफसोस नहीं है, लेकिन शादी के लिए पछता रहे हैं. आप शादी को दूसरा मौका क्यों नहीं देते." न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि बेंगलुरु ऐसी जगह नहीं है, जहां इतनी बार तलाक होते हैं और युगल अपने मिलन की ओर एक मौका दे सकते हैं. हालांकि, पति और पत्नी दोनों के वकीलों ने पीठ को बताया कि इस याचिका के लंबित रहने के दौरान, पक्षों को उनके बीच समझौते की संभावना तलाशने के लिए सुप्रीम कोर्ट मध्यस्थता केंद्र भेजा गया था.

पीठ को सूचित किया गया कि पति और पत्नी दोनों एक समझौता समझौते पर सहमत हुए हैं, जिसमें उन्होंने कुछ नियमों और शर्तों पर हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13बी के तहत आपसी सहमति से तलाक की डिक्री द्वारा अपनी शादी को भंग करने का फैसला किया है. वकीलों ने पीठ को सूचित किया कि शर्तों में से एक यह है कि पति स्थायी गुजारा भत्ता के रूप में पत्नी के सभी मौद्रिक दावों के पूर्ण और अंतिम निपटान के लिए कुल 12.51 लाख रुपये का भुगतान करेगा. पीठ ने 18 अप्रैल के अपने आदेश में कहा, "जब इस अदालत ने सवाल किया, तो पार्टियों ने कहा कि वे वास्तव में अपने विवादों को सौहार्दपूर्ण तरीके से अलग करने और आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए सहमत हुए हैं. उन्होंने यह भी कहा कि समझौते की शर्तें होंगी, उनके द्वारा पालन किया जाता है और इसलिए आपसी सहमति से तलाक की डिक्री द्वारा विवाह को भंग किया जा सकता है."

पीठ ने कहा कि परिस्थितियों में, "हमने निपटान समझौते के साथ-साथ संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दायर आवेदन को रिकॉर्ड में लिया है. हमने उसी का अवलोकन किया है. अवलोकन करने पर, हम पाते हैं कि समझौते की शर्तें वैध हैं." और समझौते की शर्तों को स्वीकार करने में कोई कानूनी बाधा नहीं है." यह भी रिकॉर्ड में लिया गया कि पति ने याचिकाकर्ता-पत्नी को कुल 12,51,000 रुपये का भुगतान किया, जिसने डिमांड ड्राफ्ट की प्राप्ति स्वीकार की है. शीर्ष अदालत ने कहा, "परिस्थितियों में, हम संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हैं और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13बी के तहत आपसी सहमति से तलाक की डिक्री द्वारा पार्टियों के बीच विवाह को भंग करते हैं." इसने दहेज निषेध अधिनियम, घरेलू हिंसा अधिनियम और अन्य जुड़े मामलों के तहत राजस्थान और लखनऊ में पति और पत्नी द्वारा दर्ज की गई विभिन्न कार्यवाही को भी रद्द कर दिया.

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